धोकेबाज बेटे की बेसहारा विधवा माँ

asanskar

मित्रों कुछ दिन पूर्व में कुछ सम्माननीय व्यक्तियों से बातचीत कर रहा था। बातचीत करते – करते एक घटना के बारे में मुझे पता लगा, तो मुझे लगा की इस विषय पर अवश्य लिखना चाहिए। इसलिए में वो घटना एक लेख के माध्यम से आप सब के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ।

एक सम्पन्न परिवार(Rich Family) में एक बालक का जन्म हुआ। माता पिता ने उसे बचपन से ही काफी लाड़ प्यार से पाला। उसे अंग्रेजी शिक्षा दिलाई और बड़ा होकर वह उच्च शिक्षा प्राप्त करके अमरीका चला गया। माता पिता कुछ वर्ष झुटे गर्व में जीते रहे की हमारा बेटा अमरीका में रह रहा है। कई वर्ष बीत गए, वह भारत नहीं आया। वह पाश्चात्य संस्कृति में पूरा डूब चूका था। कुछ समय बाद उसके पिता जी का देहांत हो गया। अब उसकी माँ घर में अकेली रहने लगीं। कुछ समय बाद वह भारत आया और अपनी माँ से कहने लगा कि माँ तुम यहां अकेली रहकर क्या करोगी? तुम मेरे साथ अमरीका चलो में वहां तुम्हारी खूब सेवा करूँगा। माँ अपने बेटे की बातों में आ गयी। उसने अपनी माँ की सारी संपत्ति बिकवादी और उनके पास जो नकदी थी वो भी ले ली। फिर माँ को अमरीका ले जाने के बहाने से विमानघर(Airport) ले गया और माँ को कहा कि तुम थोड़ी देर बैठो में यात्रा सम्बंधित कुछ जानकारी लेकर आता हूँ। काफी देर तक बेटा नहीं आया, कई जगह देखा पर दिखाई नहीं दिया। जब माँ ने किसी से पूछा की अमरीका का विमान कब जायेगा, तो वहां के अधिकारीयों ने बताया की वह तो दो घंटे पहले ही चला गया।

बूढ़ी माँ की आँखों से आँसुओं की धार फूट पड़ी और हर एक आंसू के साथ वह अपने आप को कोसने लगी। वहां खड़े कुछ लोगों को उस पर तरस आया और वह उस बूढ़ी माँ को वृद्धाश्रम में ले गए। बूढ़ी माँ जिसके पास इतनी संपत्ति थी और अपना बेटा होने बावजूद वृद्धाश्रम(Old Age Home) में रहने को मजबूर हो गयी। वृद्धाश्रम में रहते हुए वह वहाँ के अन्य वृद्धों को अपनी दर्द भरी व्यथा बताने लगी की उसने बचपन से चाहा की उसके बेटे के 90% से ऊपर अंक आएं। वह बड़ा होकर खूब धन कमाये, उसको खूब सुख संपत्ति प्राप्त हो। परन्तु इन सब के बीच मनुष्य की जो सबसे बड़ी संपत्ति, उसके संस्कार वह कहीं पीछे छूट गए। जो हमारे हिंदुस्तानी संस्कृति के संस्कार हैं, वह में अपने बेटे को नहीं दे पायी। आज मेरा बेटा पाश्चात्य संस्कृति(Western Culture) में पूरी तरह से डूब चूका है। उसे अपनी बूढ़ी माँ को इतना बड़ा धोका देते हुए जरा भी शर्म नहीं आई। उसे अपनी बूढ़ी माँ पर जरा भी तरस नहीं आया की मेरी माँ कैसे रहेगी, जिन्दा भी रहेगी या नहीं। अगर में हिन्दू परिवार के जो सभ्य संस्कार होते हैं उनपर उसके बचपन से ही जोर देती तो आज मुझे यह दिन नहीं देखना पड़ता।

मित्रों माना की आजकल की इस भागदौड़ भरी दुनिया में उच्च शिक्षा और कमाई जरुरी है। परन्तु उसके साथ – साथ जो हमारे संस्कार हैं क्या हमने वह भी संजो के रखे हैं? क्या हमारे घर के बच्चे बड़ों का आदर सत्कार करते हैं? क्या हम अपने घर में एक समय एकत्रित होकर सात्विक भोजन करते हैं? क्या हम अपने घर के मंदिर में धुप दीप आदि अपने बच्चों के साथ जलाते हैं? क्या हम अपने बच्चों को हमारे भारत के महापुरूषों की गाथाएं सुनाते हैं कि वह गाथाएं सुनकर उनके भी मन में बचपन से देशभक्ति की प्रेरणा आए? क्या हम अपने बच्चों को पवित्र स्थानों के दर्शन करवाते हैं? इस तरह की कई बातें हैं जो बचपन से ही ध्यान देनी पड़ती हैं। हमें कभी –  कभी लगता है की यह सब छोटी – छोटी बातें है, परन्तु इन बातों का जीवन में बहुत बड़ा महत्व हैं। हम सबको मिलकर भारत का विकास तो तेज गति से करना है, परन्तु पाश्चात्य संस्कृति को अपनाये बिना। हिंदुस्तान की खुशहाली तो हिन्दू संस्कृति के संस्कारों में ही है।

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